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कांग्रेस के साथ फिर साथ जाएंगे, या AAP बनाएगी तीसरा मोर्चा?

आम आदमी पार्टी (AAP) ने तीसरे मोर्चे के समर्थन में विपक्षी दलों को एक साथ लाने की बात कही है, खासकर कांग्रेस को शामिल न कर। लेकिन यह पहल फिलहाल पक्षीय राजनीति में पंजाब तथा आगामी चुनावों तक ही सिमटी हुई लगती है, और राष्ट्रीय स्तर पर इसकी कल्पना सीमित दिखती है।

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HIGHLIGHTS

  1. AAP ने तीसरे मोर्चे की पहल की
  2. विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिश
  3. इससे राष्ट्रीय गठबंधन की उम्मीद कमजोर
  4. ऐतिहासिक प्रयास लेकिन अनिश्चित भविष्य

इस आंदोलन से निकली आम आदमी पार्टी (आप) ने राजनीति में हलचल मचाई और इसके नेता अरविंद केजरीवाल ने अपनी साधारण कद-काठी और पहनावे को अपनी पहचान के रूप में पेश किया.

केजरीवाल के नेतृत्व में आम आदमी पार्टी ने 2015 में दिल्ली विधानसभा चुनाव में 70 में से 67 सीटें जीतीं, जिससे राजनीतिक हलकों में हलचल मच गई. यह सफलता भारतीय जनता पार्टी के 2014 के लोकसभा चुनाव में ‘मोदी लहर’ के तहत जीतने के कुछ ही महीनों बाद आई थी.

आम आदमी पार्टी ने मोहल्ला क्लिनिक, विश्वस्तरीय स्कूल, मुफ़्त बिजली और मुफ़्त पानी जैसी योजनाओं के माध्यम से एक मज़बूत वोट बैंक तैयार किया.

इसके बाद, 2020 के विधानसभा चुनाव में पार्टी ने फिर से ऐतिहासिक प्रदर्शन किया और 62 सीटें जीतीं. उसके कुछ ही महीने पहले 2019 के लोकसभा चुनाव में फिर भाजपा ने दिल्ली में सातों लोकसभा सीटें जीत ली थीं.

2024 के लोकसभा चुनाव में बीजेपी ने लगातार तीसरी बार दिल्ली की सभी सात सीटों पर जीत दर्ज की. इसके बावजूद, आम आदमी पार्टी का विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने का सपना अधूरा रह गया.

पार्टी को इस बार पिछले चुनावों की तुलना में लगभग 40 सीटों का नुक़सान हुआ है और 27 साल बाद दिल्ली विधानसभा में पहली बार बीजेपी को पूर्ण बहुमत मिला है. वहीं कांग्रेस लगातार तीसरी बार दिल्ली में अपना खाता नहीं खोल सकी.

अब सवाल यह उठता है कि अरविंद केजरीवाल से क्या ग़लतियाँ हुईं? उनका राजनीतिक भविष्य क्या हो सकता है? क्या मध्यम वर्ग ने इस बार बीजेपी के पक्ष में रुख़ किया?

महिलाओं और दलितों ने इस चुनाव में किसे समर्थन दिया? क्या बीजेपी मुख्यमंत्री पद के लिए नया चेहरा पेश कर सकती है? और इन परिणामों का कांग्रेस और इंडिया गठबंधन के लिए क्या मतलब है?

बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम, ‘द लेंस’ में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने इन्हीं सब मुद्दों पर चर्चा की.

इन सवालों पर चर्चा के लिए द ट्रिब्यून की असोसिएट एडिटर अदिति टंडन, इंडियन एक्सप्रेस की नेशनल ओपिनियन एडिटर वंदिता मिश्रा, सी-वोटर के संस्थापक और निदेशक यशवंत देशमुख और बीबीसी हिंदी के संवाददाता अभिनव गोयल शामिल हुए.

द ट्रिब्यून की असोसिएट एडिटर अदिति टंडन ने अरविंद केजरीवाल की हार के कारणों पर चर्चा करते हुए कहा, “केजरीवाल की सबसे बड़ी ग़लती यह थी कि जो राजनीतिक धारणा आम आदमी पार्टी लेकर चली थी, वह छोड़ते हुए नज़र आए.”

उन्होंने बताया कि “काम की राजनीति और कट्टर ईमानदार पार्टी, ये उनकी पहचान थी, लेकिन बीजेपी इस धारणा के ख़िलाफ़ माहौल बनाने में सफल रही.”

अदिति टंडन के मुताबिक़, “केजरीवाल ने इस चुनाव में अपनी काबिलियत को ओवर एस्टीमेट किया. उन्होंने पहले ही यह रुख़ अपनाया कि हमें किसी की ज़रूरत नहीं है, कोई गठबंधन नहीं चाहिए, हम अकेले ही यह चुनाव लड़ेंगे.”

अदिति टंडन ने कहा कि कांग्रेस इस विचारधारा के साथ तैयार थी कि गठबंधन कर लिया जाए, जैसा कि लोकसभा चुनाव में देखा गया था.

अदिति टंडन ने आगे कहा, “केजरीवाल की एक और ग़लती यह थी कि वह टकरावपूर्ण और पीड़ित की राजनीति करते रहे.”

अदिति ने कहा, “2013 में विक्टिम कार्ड खेलने के बाद 2015 में जनता ने उन्हें बड़ी जीत दिलाई, लेकिन उसके बाद से वह लगातार यह संदेश देते रहे कि केंद्र सरकार और एलजी उन्हें काम नहीं करने दे रहे हैं.”

Suman Ghorui

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